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अभ्यास

श्लोक 103 — आत्म-संयम

“युद्ध के मैदान में हजारों योद्धाओं को पराजित किया जा सकता है, लेकिन जो स्वयं को पराजित करता है, वही सबसे बड़ा विजेता होता है।”

शांतिपूर्वक अभ्यास करें

आज जब अधीरता, लालच या विरोधाभास की कोई आवेग उत्पन्न हो, तो उसे दबाएँ नहीं और न ही उसका अनुसरण करें: बस उसे एक लहर की तरह देखें जो बिना उसकी आज्ञा का पालन किए ऊपर उठती और नीचे जाती है।

चिंतन और स्पष्टीकरण

यह श्लोक साहस और सच्ची वीरता की परिभाषा को मौलिक रूप से बदल देता है।

समाज अक्सर बाहरी प्रभुत्व, विजय, प्रतिस्पर्धा और दूसरों या घटनाओं पर नियंत्रण को महत्व देता है। फिर भी, बाहरी विरोधियों पर विजय प्राप्त करने से अक्सर भीतर के भय, असंतोष और अत्याचार अप्रभावित रहते हैं। अस्तित्व का सच्चा रंगमंच भीतर ही स्थित है: सच्चा शत्रु दूसरा नहीं, बल्कि हमारे अपने संस्कार, हमारी बाध्यकारी इच्छाएँ और हमारी अनियंत्रित प्रतिक्रियाशीलता है। स्वयं को पराजित करने का अर्थ अपनी प्रकृति के खिलाफ युद्ध छेड़ना या अपने अहंकार को हिंसा से नष्ट करना नहीं है, बल्कि मन को दृढ़ता और करुणा के साथ साधना है। यह अपनी मनोदशाओं, आवेगों या कमजोरियों का खिलौना न बनने की क्षमता विकसित करना है। यह आंतरिक निपुणता एक योद्धा की तुलना में कहीं अधिक बहादुरी की मांग करती है, क्योंकि इसके लिए बिना किसी मुखौटे या पलायन के अपनी ही छाया का सामना करना पड़ता है। जो व्यक्ति अपने मन को वश में करने में सफल होता है, वह एक अडिग संप्रभुता प्राप्त करता है जिसे कोई भी बाहरी परिस्थिति उससे छीन नहीं सकती।

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