अभ्यास
श्लोक ८० — आंतरिक अनुशासन
« बढ़ई जल को मोड़ते हैं, तीर बनाने वाले तीरों को सीधा करते हैं, रथकार लकड़ी को गढ़ते हैं, ज्ञानी स्वयं को अनुशासित करते हैं। »
*Dama*
« बढ़ई जल को मोड़ते हैं, तीर बनाने वाले तीरों को सीधा करते हैं, रथकार लकड़ी को गढ़ते हैं, ज्ञानी स्वयं को अनुशासित करते हैं। »
शांतिपूर्वक अभ्यास करें
अपने भीतर बहती हुई प्राण ऊर्जा को एक अनमोल जलधारा के रूप में महसूस करें। इंद्रियों के बिखराव के कारण होने वाले ऊर्जा रिसावों की पहचान करें। अपनी एकाग्रता को एक सद्गुण बिंदु पर केंद्रित करके इस शक्ति को प्रवाहित करें। अपनी मुद्रा को एक शिल्पकार की भांति, जो अपनी सामग्री पर काम कर रहा हो, सटीकता से समायोजित करें। अपनी प्राण ऊर्जा को अशांति में बर्बाद होने से मना करें। अनुशासित मन की महारत और निहित शक्ति का आनंद लें।